"काँच का सपना, ग़ल ही ना जाए ....
सोच-समझ के, आँच रखना।
धीरे- धीरे, धीरे-धीरे, धीरे जलना ..... ज़िन्दगी की लौ पे जलना!
होना है जो, होना है वो, होने से वो रुकता नहीं, आसमां तो झुकता नहीं ......."
- पहेली (2005)
"कुछ रीत जगत की ऐसी हैं, हर एक सुबह की शाम हुई ....
तू कौन है? तेरा नाम है क्या??? सीता भी यहाँ, बदनाम हुई!!"
- अमर प्रेम
ज़िन्दगी तेरे गम ने हमें, रिश्ते नए समझाए ....
मिले जो हमें धूप में मिले, छाँव के ठंडे साए!!
- मासूम
छोटी सी दो झीलों में वो, बहती रहती है ..
कोई सुने, या ना सुने, कहती रहती है ...
कुछ लिख के और कुछ ज़ुबानी ... थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी , और एक कहानी ..
दो नैना और एक कहानी!
- मासूम
मनवा में मेरे आँधी है उठी, और स्तभ्ध खड़ी हूँ मैं ,
साँसों में बाँध अपनी ही सांस, निःशब्द खड़ी हूँ मैं ...
दुनिया से जीत जीती, खुद से हारी, बस ध्वस्त खड़ी हूँ मैं ...
आइना मैं, और अक्स मैं, मदमस्त खड़ी हूँ मैं!
मेरी लाज मैं हूँ, चूनर भी मैं हूँ, चूनर पे दाग भी मैं!!
मैं ध्वस्त ध्वस्त, मैं नष्ट पष्ट , मैं सरल विरल, मैं अति विशिष्ठ ,
मैं श्याम श्वेत, बादल में रेत् , निर्झर सी झरी हूँ मैं ....
अंधियारी रात, दीपक में बाती, स्वप्निल से खड़ी हूँ मैं ..
कंचन की काया, अपना ही साया, बस खुद से डरी हूँ मैं!!
लकड़ी में गीली, थोड़ी सीली सीली, थम थम के जली हूँ मैं!
मैं माया माया, मैं छाया छाया, आत्मा और काया मैं,
निःस्तभ्ध खड़ी हूँ मैं, निःशब्द खड़ी हूँ मैं, विश्वस्त खड़ी हूँ मैं, सर्वत्र खड़ी हूँ मैं, सर्वत्र खड़ी हूँ मैं !
- लागा चुनरी में दाग (2007)
हो गई मैली, मोरी चुनरिया, कोरे बदन सी कोरी चुनरिया!
जाके बाबुल से नजरें मिलाऊं कैसे .. घर जाऊं कैसे ...
लागा चुनरी में दाग ... छुपाऊं कैसे, लागा चुनरी में दाग ....
ओ री चुनरिया, आत्मा मोरी, मैल है माया जाल ..
वो दुनिया मेरी बाबुल का घर, ये दुनिया ससुराल...
जाके बाबुल से नजरें मिलाऊं कैसे ? घर जाऊं कैसे???
-दिल ही तो है (1963, Lyrics: Sahir Ludhiyanwi)