Sunday, March 3, 2013

मन

http://www.youtube.com/watch?v=BS9mCRinBtA

!!!!!!
When I created the poem, i only saw the first line (kayi baar........todane lagta hai) in one of my diaries and I was unaware at the moment that this is not my creation, but an existing song... 
So I just extended.. 
But abhi pata chala... yeh bahut pyara gana hai ek.. link is given above (super lovely song)
Anyway, here is my version of the verse..
!!!!!!!

कई बार यूँही होता है ...
ये जो मन की सीमा रेखा है,
मन तोड़ने लगता है !

टूटन की खनक को इतनी बार आगोश में लिया है,

की तोड़ने से वैसे तो बहुत डरता है,

पर कई बार यूँ होता है. ..

डर से परे, ये बावरा, उतावला,
टूटे हुए बन्धनों को तोड़ने लगता है 

फिसलता है, लड़खड़ाता है,

छिले  हुए कदमों से, दो गज़ और लाँघता है,

फिर यूँही कभी- कभी होता है,

लुढ़कते लुढ़कते वो अचानक उछलता है, 
नब्ज़ पकड़ता है मेरी और तोड़ने लगता है ..

बिलखते आंसुओं को देख, सहसा, सशक्त हो जाता है,

इंतज़ार - हाँ!! 'इंतज़ार' का ढाँढस बँधाता है फिर!!

..पर कई बार यूँ होता है ..

ये जो मन की सीमा रेखा है ,
मन तोड़ने लगता है !
.........................................***..........................................

~~~~~~~~~~~~~~~~MEERA~~~~~~~~~~~~~~
जो तुम तोड़ो पिया,
मैं नाहि तोडूं...  मैं नाही तोडूं।
तोसो प्रीत तोड़ कृष्णा, कौन संग जोडूं ??
जो तुम तोड़ो पिया, मैं नाही तोडूं ... !!
~~~~~~~~~~~~~~~~MEERA~~~~~~~~~~~~~~

A past unforgotten...


कब लिखी गयी थी,याद नहीं ... (शायद २०१० में )
पर सोचा, कागजों में दबी-दबी कहीं खो न जाए यूँही ....
सो आज ले आई हूँ अपनी e-दैनंदिनी  में, यह छोटी सी प्रश्नावली  ..

"आवाज़" की चाश्नी  
गहरी - गहरी सी लगी इतनी
कि मुझे गहराई में डुबो गयी;

सुलझी हुई तो थी पर,
कानों तक जो पहुंची मेरे,
क्यों मुझे उलझा गयी?

और कितनी अदाएं 
यूँ ही छुपा रक्खी हैं तुमने?

मुझे तो तुम्हारी "आवाज़" की चाश्नी 
तुम में ही पिघला गयी ...