Friday, October 26, 2012

ज़िन्दगी, तेरे नाम- 2 !!

ज़िन्दगी तेरे नाम कई ख्वाहिशें पड़ी हैं,
मैं डूब रही हूँ, पर तेरी आस अभी बाकी है,
हर तरफ पानी है, पर मेरी प्यास अभी बाकी है .. 
कुछ पुराने बुने सपनों की अब भी कड़ियाँ पड़ी हैं !!

क्षितिज दूर है, तू रेत् तक पहुचने दे,

वो किनारे पर इंतज़ार करतीं, कई शिकायतें पड़ी हैं ..
तू थक जायेगी पर डुबो ना सकेगी मुझे,
तैरने की मुझमें शोखियाँ पड़ी हैं !





और शायद किसी लकड़ी की कश्ती मैं बना लूं ..
समंदर की तलहटी में अभी मेरी परछाईयाँ पड़ी हैं,
या शायद, मैं उस मोती को ही पा लूं
जिसकी उम्मीद पे बरसों से मेरी साँसें चल रहीं हैं!




बेजान नहीं हुई हूँ, अभी कई रंगीन बंदिशें पड़ी हैं ..
मेरी कलम की नोक पर तेरे नाम कई सलामियाँ पड़ी हैं ..
सफ़र बहुत लम्बा है अभी मेरी हम-नफ़ज़,
किनारे पर पहुँच  कर, तुझे सुकून से सुनाउंगी, 
......कि ज़िन्दगी, तेरे नाम, कितनीsssss ख्वाहिशें पड़ी हैं .....!!! 


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ज़िन्दगी, तेरे नाम!

ज़िन्दगी तेरे नाम कई ख्वाहिशें पड़ी हैं ..
तेरी वादियों में हिचकोले खाती मेरी रातें पड़ी हैं 
कभी नर्म सी माटी में बेसुध मैं पड़ी रहूँ,
या कभी उड़ते-उड़ते हर पंछी को, पीछे' छोड़ने की चाहतें पड़ी हैं ..

कभी सारी  दुनिया को अपनी एहमियत मैं जताऊँ ,

या कभी बुझते दीये -सी, किसी की बाहों में सिमट जाऊं 
आँखें जो खोलूँ फिर मैं खुद को ना ढूंढ पाऊँ ...
..और ऐसी ही सिसकती कईss आँहें पड़ी हैं .!!

मैं दूssर कहीं दूर, किसी हरियाले बाग़ान में पड़ी हूँ 

और झिमझिमाती बूँदें उस सफ़ेद आकाश की, मेरी आँखों पे गिर पड़ी हों .. 
कोई हड़बड़ नहीं, बड़ी तबियत से खड़ी हूँ !!
और यूँहीं कुछ गुनगुनाते हुए सपनों की अनगिनत लड़ियाँ  पड़ी हैं ..







ज़िन्दगी, तेरे नाम कईssss  ख्वाहिशें पड़ी हैं!!!


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