ज़िन्दगी ऐसे मोड़ पे लायी है मुझे
सामने समुद्र और पीछे खुद की परछाई से डराई है मुझे
आ उड़ चल, आकाश ऐसा कहने लगा है...
"बादलों की सैर के बाद धरती पे बरसाऊंगा तुझे",
मोतियों सा बिखर के गुम हो जायेगा अंग अंग मेरा,
और तब कहीं आयेंगीं नयी कोपलें धरती पर ...
मुझसे सिंची हुई, लहलाती हवाओं में,
शायद धन्यवाद देंगीं, या शायद भूल जायेंगीं मुझे...
और तब कहीं आयेंगीं नयी कोपलें धरती पर ...
मुझसे सिंची हुई, लहलाती हवाओं में,
शायद धन्यवाद देंगीं, या शायद भूल जायेंगीं मुझे...