कांच के टुकड़ों में झांकता एक चेहरा है
जो खुद को देख के मुस्कुराता है
मैंने पूछा है कई बार क्यों कांच तोड़ते हो
देखने को तो शीशा भी काफी होता है
हर बार बड़ी शीतलता से मुझे
नादान समझ बस मुस्कुरा देता है...
आज फिर टूटा एक कांच कहीं
मुझे याद अचानक उस चेहरे की आयी
और आज झांक के मैंने भी टुकड़ो में खुद को देखा है
एक नहीं अनगिनत चेहरे दिखे!!
कहाँ शीशे में खुद का एक चेहरा देखते हैं हम..
टुकड़ो में देखो लगेगा अकेले नहीं कई चेहरों में हैं हम..
कांच तोड़ने का यह बहाना अच्छा है
वो टूट के कहाँ फिर जुड़ता है .....
काम भी हो तसल्ली भी हो..
और कहाँ यह आराम मिलता है..
पर याद रखना देखते देखते छू न देना उन टुकड़ो को
वो "कांच" है.. बड़ी तेज़ चुभता है!!!!